विचित्र वीर हनुमान स्तोत्र हिंदी में , न्यास एवं ध्यान एवं पूर्ण पाठ विधान सहित
विचित्रवीर हनुमान स्तोत्र के पाठ से कुंडली में शनि-मंगल के दोष , सड़क दुर्घटनाओं से बचाव, शारीरिक कष्ट एवं दांपत्य जीवन में अशांति से मुक्ति मिलती है।
विचित्र वीर हनुमान स्तोत्र हिंदी में, न्यास एवं ध्यान एवं पूर्ण पाठ विधान सहित

अस्य श्रीविचित्रवीर हनुमन्मालामन्त्रस्य श्रीरामचन्द्रो भगवानृषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीविचित्रवीरहनुमान् देवता, ममाभीष्टसिद्ध्यर्थे मालामन्त्र जपे विनियोगः ।
हिंदी भावार्थ : - इस श्री विचित्रवीर हनुमान माला-मंत्र के ऋषि भगवान श्रीरामचंद्र हैं, इसका छंद अनुष्टुप् है, इसके देवता श्री विचित्रवीर हनुमान हैं। मेरी अभीष्ट मनोकामना की सिद्धि के लिए इस माला-मंत्र के जप का विनियोग किया जाता है।
अथ करन्यासः ।
ॐ ह्रां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
हिंदी भावार्थ : - दोनों अंगूठों में स्थित देवता को नमस्कार। मेरे हाथ की मूल शक्ति, सामर्थ्य और कर्मशक्ति देवता को समर्पित हो तथा मेरे द्वारा किए जाने वाले सभी कर्म पवित्र और कल्याणकारी बनें।
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः ।
हिंदी भावार्थ : -दोनों तर्जनी अंगुलियों में स्थित देवता को नमस्कार। मेरी तर्जनी से जुड़ी शक्ति और संकेत करने की प्रवृति पवित्र एवं संयमित हो , मेरे द्वारा किए जाने वाले कर्म और दिए जाने वाले निर्देश धर्म, सत्य और कल्याण की दिशा में हों।
ॐ ह्रूं मध्यमाभ्यां नमः ।
हिंदी भावार्थ : -दोनों मध्यमा अंगुलियों में स्थित देवता को नमस्कार। मेरी कर्मेन्द्रियों की शक्ति संतुलित और पवित्र हो तथा मेरे हाथों से होने वाले कर्म देवता को समर्पित होकर शुभ एवं कल्याणकारी बनें।
ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां नमः ।
हिंदी भावार्थ : -दोनों अनामिका अंगुलियों में स्थित देवता को नमस्कार। मेरे हाथों की शक्ति पवित्र हों और मेरे द्वारा किए जाने वाले सभी कर्म देवता को समर्पित हो कर धर्म, शुभता और कल्याण के साधन बनें।
ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
हिंदी भावार्थ : -दोनों कनिष्ठिका अंगुलियों में स्थित देवता को नमस्कार। मेरे हाथों की सूक्ष्म कर्मशक्ति पवित्र हों और इन हाथों से वाले सभी कर्म देवता को समर्पित हो कर कल्याणकारी बनें।
ॐ ह्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
हिंदी भावार्थ : - दोनों हाथों की हथेलियों और हाथों के पृष्ठभाग में स्थित देवता को नमस्कार। मेरे दोनों हाथों से होने वाले सभी कर्म देवता को समर्पित हों और मेरे हाथ दिव्य, पवित्र एवं कल्याणकारी कार्यों के साधन बनें।
अथ अङ्गन्यासः
ॐ ह्रां हृदयाय नमः।
हिंदी भावार्थ : -मैं अपने हृदय को देवता की दिव्य शक्ति को समर्पित करता हूँ। मेरे हृदय में देवता की भक्ति, प्रेम और दिव्य चेतना प्रतिष्ठित हो।
ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा।
हिंदी भावार्थ : - मैं अपने सिर और मस्तिष्क को देवता की दिव्य शक्ति को समर्पित करता हूँ। मेरा विचार और बुद्धि उस दिव्य शक्ति से पवित्र और निर्देशित हो। ।
ॐ ह्रूं शिखायै वषट्।
हिंदी भावार्थ : - मेरी शिखा में देवता की दिव्य शक्ति प्रतिष्ठित और सुरक्षित हो।
ॐ ह्रैं कवचाय हुम्।
हिंदी भावार्थ : - कवच स्वरूप देवता को नमस्कार है। वे मेरे चारों ओर सुरक्षा कवच स्थापित करें।
ॐ ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्।
हिंदी भावार्थ : - मेरे तीनों नेत्रों में देवता की दिव्य दृष्टि और चेतना प्रतिष्ठित हो , मेरी बाहरी और आतंरिक दृष्टि सत्य और विवेक से प्रकाशित हो।
ॐ ह्रः अस्त्राय फट्।
हिंदी भावार्थ : - मेरे चारों ओर देवता की दिव्य रक्षाशक्ति रहे और सभी नकारात्मक , बाधक तथा अशुभ प्रभाव मुझ से दूर हों।
अथ ध्यानम् ।
वामे करे वैरवहं वहन्तं शैलं परे श्रृङ्खलमालयाढ्यम् ।
दधानमाध्मातसुवर्णवर्णं भजे ज्वलत्कुण्डलमाञ्जनेयम् ॥
हिंदी भावार्थ : - मैं माता अंजनी के पुत्र श्री हनुमान का ध्यान करता हूँ, जिनका स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और प्रज्वलित है तथा जिनका वर्ण दमकते हुए स्वर्ण के समान है। वे अपने बाएँ हाथ में भयंकर अस्त्र/आयुध धारण किए हुए हैं और दूसरे हाथ में पर्वत तथा शृंखलाओं से युक्त स्वरूप धारण किए हुए हैं। उनके कानों में प्रकाशित एवं चमकते हुए कुण्डल शोभायमान हैं। यहाँ हनुमानजी के उग्र, वीर, तेजस्वी और बंधनों को तोड़ने वाले स्वरूप का ध्यान कराया गया है।
श्री विचित्रवीर हनुमान मंत्र
ॐ नमो भगवते विचित्रवीरहनुमते।
हे भगवान विचित्रवीर हनुमान! आपको नमस्कार।
प्रलयकालानल प्रभाप्रज्वलनाय। प्रताप-वज्रदेहाय।
जिनका प्रताप प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रचंड और प्रकाशमान है तथा जिनका शरीर वज्र के समान दृढ़ है, उन हनुमानजी को नमस्कार।
अञ्जनीगर्भसम्भूताय।
जो माता अंजनी के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं।
प्रकटविक्रमवीर-दैत्य-दानव-यक्ष-राक्षस-गण-ग्रहबन्धनाय।
जो अपने प्रकट पराक्रम और वीरता से दैत्य, दानव, यक्ष और राक्षस आदि के बंधनकारी प्रभावों को रोकने/बांधने वाले हैं।
भूतग्रहबंधनाय। प्रेतग्रहबंधनाय। पिशाचग्रहबंधनाय।
शाकिनीडाकिनीग्रहबंधनाय। काकिनीकामिनीग्रहबंधनाय।
ब्रह्मग्रहबंधनाय। ब्रह्मराक्षसग्रहबंधनाय। चोरग्रहबंधनाय।
मारीग्रहबंधनाय।
जो भूत, प्रेत, पिशाच, शाकिनी, डाकिनी, काकिनी, कामिनी, ब्रह्मग्रह, ब्रह्मराक्षस आदि कहे जाने वाले बाधाकारी प्रभावों तथा चोर आदि से उत्पन्न संकटों को रोकने/बांधने वाले हैं।
आह्वान
एहि एहि, आगच्छ आगच्छ, आवेशय आवेशय।
हे हनुमान! आइए, आइए; पधारिए, पधारिए; मेरे भीतर अपनी शक्ति का आवेश करिए।
मम हृदयं प्रवेशय प्रवेशय।
मेरे हृदय में प्रवेश करें, प्रवेश करें।
स्फुर स्फुर, प्रस्फुर प्रस्फुर।
अपनी शक्ति को प्रकट करें, प्रकट करें; पूर्ण रूप से प्रकाशित हों।
सत्यं कथय कथय।
सत्य कहें, सत्य कहें।
व्याघ्रमुखं बन्धय बन्धय।
व्याघ्र के समान हिंसक/भयंकर शत्रु के मुख को रोकें, रोकें।
सर्पमुखं बन्धय बन्धय।
सर्प के समान विषैले/कपटी शत्रु के मुख को रोकें।
राजमुखं बन्धय बन्धय। नारीमुखं बन्धय बन्धय।
राजसत्ता अथवा शासकीय विरोध के मुख को रोकें।
सभामुखं बन्धय बन्धय।
सभा में होने वाले विरोध/विरोधियों के मुख को रोकें।
शत्रुमुखं बन्धय बन्धय।
शत्रुओं के मुख को रोकें।
सर्वमुखं बन्धय बन्धय।
सभी विरोधी मुखों को रोकें।
हनुमानजी के पराक्रम का स्मरण, वशीकरण/अनुकूलता, शत्रु-विनाश की प्रार्थना
लङ्काप्रासादभञ्जन। सर्वजनं मे वशमानय वशमानय।
हे लंका के प्रासादों को भंग करने वाले वीर हनुमान! सभी लोगों को मेरे अनुकूल करें, मेरे प्रति अनुकूलता उत्पन्न करें।
श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं। सर्वान् आकर्षय आकर्षय।
(ये बीजमंत्र हैं। इनका सामान्य शब्दार्थ नहीं किया जाता। परंपरागत मंत्र-व्याख्या में श्रीं को समृद्धि/श्री-शक्ति, ह्रीं को महामाया/शक्ति तथा क्लीं को आकर्षण-शक्ति से संबद्ध माना जाता है। सभी को आकर्षित करें, अनुकूल रूप से अपनी ओर आकृष्ट करें।)
शत्रून् मर्दय मर्दय। मारय मारय। चूर्णय चूर्णय।
शत्रुओं के अहंकार और विरोधी शक्ति को कुचल दें। विरोधी/हानिकारक शक्ति का नाश करें। विरोधी बाधाओं को चूर्ण-विचूर्ण कर दें।
खे खे खे। श्रीरामचन्द्राज्ञया प्रज्ञया। मम कार्यसिद्धिं कुरु कुरु। मम शत्रून् भस्मी कुरु कुरु स्वाहा।
हे आकाशगामी/व्यापक शक्ति! भगवान श्रीरामचंद्र की आज्ञा और दिव्य प्रज्ञा के द्वारा मेरे कार्य की सिद्धि करें, करें। मेरे शत्रुओं की विरोधी शक्ति को भस्म कर दें।
विचित्रवीर हनुमान के बीजमंत्र
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः फट्।
श्रीविचित्रवीरहनुमते। मम सर्वशत्रून् भस्मी कुरु कुरु। हन हन। हुं फट् स्वाहा।
श्री विचित्रवीर हनुमान को मेरे सभी शत्रुओं की विरोधी शक्ति को भस्म कर दें। हानिकारक/विरोधी शक्तियों का नाश करें। रक्षा, बाधा-निवारण तथा समर्पण का मंत्रात्मक विधान।
एकादशशतवारं जपित्वा सर्वशत्रून् वशमानयति नान्यथा इति।
इस मंत्र का 1100 बार जप करने से सभी शत्रुओं को वश में किया जाता है।
इति श्रीविचित्रवीरहनुमन्मालामन्त्रः सम्पूर्णम्।
इस प्रकार श्री विचित्रवीर हनुमान माला-मंत्र सम्पूर्ण हुआ।
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विचित्रवीर हनुमान माला मंत्र क्या है? इसका पूजन विधान क्या है?
यह भगवान हनुमान के वीर और उग्र स्वरूप से संबंधित एक पारंपरिक माला-मंत्र है, जिसमें रक्षा, बाधा-निवारण और कार्य-सिद्धि की प्रार्थना की गई है।
विशेष पूजन विधान : संध्या काल में लाल वस्त्र बिछाकर श्री विचित्र वीर हनुमान का उत्तरमुखी होकर विधिवत पूजन करें, तिल के तेल का दीप - धूप करें, पीपल के पत्ते चढ़ाएं, काजल चढ़ाएं, उड़द से बने मिष्ठन का भोग लगाएं तथा रुद्राक्ष माला से इस विशिष्ट मंत्र का 108 बार जाप करें। इसके बाद भोग काली गाय को खिला दें।
विचित्र वीर हनुमान कौन हैं?
विचित्र वीर हनुमान, भगवान हनुमान का ही एक अत्यंत शक्तिशाली, चमत्कारिक और रहस्यमयी स्वरूप या नाम है। हनुमान जी को 'विचित्रवीर' इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे हर विकट या असंभव परिस्थिति में अपने भक्तों की रक्षा के लिए अप्रत्याशित और चमत्कारिक रूप से प्रकट होते हैं। संकट, भूत-प्रेत बाधा, शत्रु षड्यंत्र और अज्ञात भय से मुक्ति पाने के लिए इनके विशेष 'माला मंत्र' और स्तोत्र का पाठ किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि जब सामान्य उपायों या मंत्रों से समाधान नहीं मिलता, तब विचित्र वीर हनुमान के स्वरूप का स्मरण और उनकी उपासना सारे संकटों को तुरंत दूर कर देती है।
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